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द्रोण पर्व
अध्याय १६४
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सञ्जय़ उवाच
पार्षतेन परामृष्टं ज्वलन्तमिव तद्धनुः |  ११६   क
अन्तकालमिव प्राप्तं मेनिरे वीक्ष्य सैनिकाः ||  ११६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति