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द्रोण पर्व
अध्याय १६४
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सञ्जय़ उवाच
तस्य त्वहानि चत्वारि क्षपा चैकास्यतो गता |  ११९   क
तस्य चाह्नस्त्रिभागेन क्षय़ं जग्मुः पतत्रिणः ||  ११९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति