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द्रोण पर्व
अध्याय १६४
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सञ्जय़ उवाच
तं शरं शतधा चास्य द्रोणश्चिच्छेद साय़कैः |  १२४   क
ध्वजं धनुश्च निशितैः सारथिं चाप्यपातय़त् ||  १२४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति