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द्रोण पर्व
अध्याय १६४
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सञ्जय़ उवाच
तां दृष्ट्वा तु नरव्याघ्रो द्रोणेन निहतां शरैः |  १३५   क
विमलं खड्गमादत्त शतचन्द्रं च भानुमत् ||  १३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति