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द्रोण पर्व
अध्याय १६४
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सञ्जय़ उवाच
ततः स्वरथनीडस्थः स्वरथस्य रथेषय़ा |  १३७   क
अगच्छदसिमुद्यम्य शतचन्द्रं च भानुमत् ||  १३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति