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द्रोण पर्व
अध्याय १६४
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सञ्जय़ उवाच
ते हता न्यपतन्भूमौ धृष्टद्युम्नस्य वाजिनः |  १४३   क
शोणाश्च पर्यमुच्यन्त रथवन्धाद्विशां पते ||  १४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति