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द्रोण पर्व
अध्याय १६४
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सञ्जय़ उवाच
परिवृत्तं निवृत्तं च खड्गं चर्म च धारय़न् |  १४८   क
सम्पातं समुदीर्णं च दर्शय़ामास पार्षतः ||  १४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति