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द्रोण पर्व
अध्याय १६४
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सञ्जय़ उवाच
चरन्तं रथमार्गेषु सात्यकिं सत्यविक्रमम् |  १५४   क
द्रोणकर्णान्तरगतं कृपस्यापि च भारत |  १५४   ख
अपश्येतां महात्मानौ विष्वक्सेनधनञ्जय़ौ ||  १५४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति