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द्रोण पर्व
अध्याय १६४
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सञ्जय़ उवाच
अपूजय़ेतां वार्ष्णेय़ं व्रुवाणौ साधु साध्विति |  १५५   क
दिव्यान्यस्त्राणि सर्वेषां युधि निघ्नन्तमच्युतम् |  १५५   ख
अभिपत्य ततः सेनां विष्वक्सेनधनञ्जय़ौ ||  १५५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति