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द्रोण पर्व
अध्याय १६४
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सञ्जय़ उवाच
यच्छिक्षय़ानुद्धतः सन्रणे चरति सात्यकिः |  १५८   क
महारथानुपक्रीडन्वृष्णीनां कीर्तिवर्धनः ||  १५८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति