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द्रोण पर्व
अध्याय १६४
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सञ्जय़ उवाच
द्वाभ्यां द्वाभ्यां यमौ सार्धं रथाभ्यां रथपुङ्गवौ |  १७   क
समासक्तौ ततो द्रोणं धृष्टद्युम्नोऽभ्यवर्तत ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति