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द्रोण पर्व
अध्याय १६४
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सञ्जय़ उवाच
यदि तेऽहं प्रिय़ो राजञ्जहि मां मा चिरं कृथाः |  ३१   क
त्वत्कृते सुकृताँल्लोकान्गच्छेय़ं भरतर्षभ ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति