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द्रोण पर्व
अध्याय १६४
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सञ्जय़ उवाच
तं सात्यकिः प्रत्यविद्धत्तथैव दशभिः शरैः |  ३७   क
पञ्चाशता पुनश्चाजौ त्रिंशता दशभिश्च ह ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति