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द्रोण पर्व
अध्याय १६४
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सञ्जय़ उवाच
समाश्वस्य तु पुत्रस्ते सात्यकिं पुनरभ्ययात् |  ४०   क
विसृजन्निषुजालानि युय़ुधानरथं प्रति ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति