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द्रोण पर्व
अध्याय १६४
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सञ्जय़ उवाच
स तु दुःशासनं वाणैर्विमुखीकृत्य पार्षतः |  ५   क
किरञ्शरसहस्राणि द्रोणमेवाभ्ययाद्रणे ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति