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द्रोण पर्व
अध्याय १६४
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सञ्जय़ उवाच
जित्वा च वहुभिर्यज्ञैर्यक्ष्यध्वं भूरिदक्षिणैः |  ५२   क
हता वा देवसाद्भूत्वा लोकान्प्राप्स्यथ पुष्कलान् ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति