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द्रोण पर्व
अध्याय १६४
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सञ्जय़ उवाच
वध्यमानेषु सङ्ग्रामे पाञ्चालेषु महात्मना |  ६२   क
उदीर्यमाणे द्रोणास्त्रे पाण्डवान्भय़माविशत् ||  ६२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति