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द्रोण पर्व
अध्याय १६४
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सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वाश्वनरसङ्घानां विपुलं च क्षय़ं युधि |  ६३   क
पाण्डवेय़ा महाराज नाशंसुर्विजय़ं तदा ||  ६३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति