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द्रोण पर्व
अध्याय १६४
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सञ्जय़ उवाच
आस्थीय़तां जय़े योगो धर्ममुत्सृज्य पाण्डव |  ६८   क
यथा वः संय़ुगे सर्वान्न हन्याद्रुक्मवाहनः ||  ६८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति