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द्रोण पर्व
अध्याय १६४
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सञ्जय़ उवाच
स लव्ध्वा चेतनां द्रोणः क्षणेनैव समाश्वसत् |  ७६   क
अनुचिन्त्यात्मनः पुत्रमविषह्यमरातिभिः ||  ७६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति