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द्रोण पर्व
अध्याय १६४
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सञ्जय़ उवाच
तं वै विंशतिसाहस्राः पाञ्चालानां नरर्षभाः |  ७८   क
तथा चरन्तं सङ्ग्रामे सर्वतो व्यकिरञ्शरैः ||  ७८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति