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द्रोण पर्व
अध्याय १६४
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सञ्जय़ उवाच
ततो व्यरोचत द्रोणो विनिघ्नन्सर्वसोमकान् |  ८०   क
शिरांस्यपातय़च्चापि पाञ्चालानां महामृधे |  ८०   ख
तथैव परिघाकारान्वाहून्कनकभूषणान् ||  ८०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति