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द्रोण पर्व
अध्याय १६४
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सञ्जय़ उवाच
पुनः पञ्चशतान्मत्स्यान्षट्सहस्रांश्च सृञ्जय़ान् |  ८५   क
हस्तिनामय़ुतं हत्वा जघानाश्वाय़ुतं पुनः ||  ८५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति