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द्रोण पर्व
अध्याय १६४
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सञ्जय़ उवाच
क्षत्रिय़ाणामभावाय़ दृष्ट्वा द्रोणमवस्थितम् |  ८६   क
ऋषय़ोऽभ्यागमंस्तूर्णं हव्यवाहपुरोगमाः ||  ८६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति