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द्रोण पर्व
अध्याय १६४
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सञ्जय़ उवाच
विश्वामित्रो जमदग्निर्भारद्वाजोऽथ गौतमः |  ८७   क
वसिष्ठः कश्यपोऽत्रिश्च व्रह्मलोकं निनीषवः ||  ८७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति