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द्रोण पर्व
अध्याय १६४
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सञ्जय़ उवाच
सिकताः पृश्नय़ो गर्गा वालखिल्या मरीचिपाः |  ८८   क
भृगवोऽङ्गिरसश्चैव सूक्ष्माश्चान्ये महर्षय़ः ||  ८८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति