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द्रोण पर्व
अध्याय १६४
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सञ्जय़ उवाच
न्यस्याय़ुधं रणे द्रोण समेत्यास्मानवस्थितान् |  ९०   क
नातः क्रूरतरं कर्म पुनः कर्तुं त्वमर्हसि ||  ९०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति