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द्रोण पर्व
अध्याय १६४
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सञ्जय़ उवाच
न्यस्याय़ुधममोघेषो तिष्ठ वर्त्मनि शाश्वते |  ९२   क
परिपूर्णश्च कालस्ते वस्तुं लोकेऽद्य मानुषे ||  ९२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति