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द्रोण पर्व
अध्याय १६४
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सञ्जय़ उवाच
ततो निष्पाण्डवामुर्वीं करिष्यन्तं युधां पतिम् |  ९७   क
द्रोणं ज्ञात्वा धर्मराजं गोविन्दो व्यथितोऽव्रवीत् ||  ९७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति