अनुशासन पर्व  अध्याय ११७

युधिष्ठिर उवाच

इमे वै मानवा लोके भृशं मांसस्य गृद्धिनः |  १   क
विसृज्य भक्षान्विविधान्यथा रक्षोगणास्तथा ||  १   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति