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शान्ति पर्व
अध्याय १६५
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भीष्म उवाच
ततः प्रदुद्रुवुः सर्वे विप्रसङ्घाः समन्ततः |  २४   क
गौतमोऽपि सुवर्णस्य भारमादाय़ सत्वरः ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति