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वन पर्व
अध्याय १८६
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मार्कण्डेय़ उवाच
किमर्थं च जगत्सर्वं शरीरस्थं तवानघ |  १२७   क
किय़न्तं च त्वय़ा कालमिह स्थेय़मरिन्दम ||  १२७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति