वन पर्व  अध्याय २१४

मार्कण्डेय़ उवाच

गृहीतं तु धनुस्तेन विपुलं लोमहर्षणम् |  २०   क
न्यस्तं यत्त्रिपुरघ्नेन सुरारिविनिकृन्तनम् ||  २०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति