वन पर्व  अध्याय १६५

अर्जुन उवाच

ववन्ध चैव मे मूर्ध्नि किरीटमिदमुत्तमम् |  १३   क
स्वरूपसदृशं चैव प्रादादङ्गविभूषणम् ||  १३   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति