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वन पर्व
अध्याय १६५
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अर्जुन उवाच
ततः प्राय़ामहं तेन स्यन्दनेन विराजता |  १५   क
येनाजय़द्देवपतिर्वलिं वैरोचनिं पुरा ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति