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वन पर्व
अध्याय १६५
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अर्जुन उवाच
तुष्टुवुर्मां प्रसन्नास्ते यथा देवं पुरन्दरम् |  १८   क
रथेनानेन मघवा जितवाञ्शम्वरं युधि |  १८   ख
नमुचिं वलवृत्रौ च प्रह्लादनरकावपि ||  १८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति