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वन पर्व
अध्याय १६५
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अर्जुन उवाच
न त्वमद्य युधा जेतुं शक्यः सुरगणैरपि |  २   क
किं पुनर्मानुषे लोके मानुषैरकृतात्मभिः |  २   ख
अप्रमेय़ोऽप्रधृष्यश्च युद्धेष्वप्रतिमस्तथा ||  २   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति