वन पर्व  अध्याय १६५

अर्जुन उवाच

त्वमप्येतेन कौन्तेय़ निवातकवचान्रणे |  २०   क
विजेता युधि विक्रम्य पुरेव मघवान्वशी ||  २०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति