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वन पर्व
अध्याय १६५
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अर्जुन उवाच
अय़ं च शङ्खप्रवरो येन जेतासि दानवान् |  २१   क
अनेन विजिता लोकाः शक्रेणापि महात्मना ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति