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वन पर्व
अध्याय १६५
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अर्जुन उवाच
प्रदीय़मानं देवैस्तु देवदत्तं जलोद्भवम् |  २२   क
प्रत्यगृह्णं जय़ाय़ैनं स्तूय़मानस्तदामरैः ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति