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वन पर्व
अध्याय १६५
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अर्जुन उवाच
स शङ्खी कवची वाणी प्रगृहीतशरासनः |  २३   क
दानवालय़मत्युग्रं प्रय़ातोऽस्मि युय़ुत्सय़ा ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति