वन पर्व  अध्याय १६५

अर्जुन उवाच

अप्रमत्तः सदा दक्षः सत्यवादी जितेन्द्रिय़ः |  ४   क
व्रह्मण्यश्चास्त्रविच्चासि शूरश्चासि कुरूद्वह ||  ४   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति