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उद्योग पर्व
अध्याय १६५
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सञ्जय़ उवाच
स्पर्धते हि सदा नित्यं सर्वेण जगता सह |  २३   क
न चान्यं पुरुषं कञ्चिन्मन्यते मोघदर्शनः ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति