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उद्योग पर्व
अध्याय १६५
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सञ्जय़ उवाच
रणे रणेऽतिमानी च विमुखश्चैव दृश्यते |  ८   क
घृणी कर्णः प्रमादी च तेन मेऽर्धरथो मतः ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति