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द्रोण पर्व
अध्याय १६५
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कृप उवाच
सहस्रं रथसिंहानां द्विसाहस्रं च दन्तिनाम् |  १०२   क
द्रोणो व्रह्मास्त्रनिर्दग्धं प्रेषय़ामास मृत्यवे ||  १०२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति