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द्रोण पर्व
अध्याय १६५
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कृप उवाच
तेषु किञ्चित्प्रभग्नेषु विमुखेषु सपत्नजित् |  १०५   क
दिव्यमस्त्रं विकुर्वाणो वभूवार्क इवोदितः ||  १०५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति