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द्रोण पर्व
अध्याय १६५
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कृप उवाच
स मध्यं प्राप्य पाण्डूनां शररश्मिः प्रतापवान् |  १०६   क
मध्यङ्गत इवादित्यो दुष्प्रेक्ष्यस्ते पिताभवत् ||  १०६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति