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द्रोण पर्व
अध्याय १६५
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कृप उवाच
ते दह्यमाना द्रोणेन सूर्येणेव विराजता |  १०७   क
दग्धवीर्या निरुत्साहा वभूवुर्गतचेतसः ||  १०७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति