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द्रोण पर्व
अध्याय १६५
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कृप उवाच
नैष जातु परैः शक्यो जेतुं शस्त्रभृतां वरः |  १०९   क
अपि वृत्रहणा सङ्ख्ये रथय़ूथपय़ूथपः ||  १०९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति