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द्रोण पर्व
अध्याय १६५
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कृप उवाच
अश्वत्थाम्नि हते नैष युध्येदिति मतिर्मम |  १११   क
हतं तं संय़ुगे कश्चिदाख्यात्वस्मै मृषा नरः ||  १११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति